इस बार नहीं

इस गणतंत्र दिवस पर प्रसून जोशी कि एक कविता उद्द्रित करता हूँ. हमे अब समझ लेना चाहिए कि गणतंत्र दिवस का महत्व राष्ट्रीय अवकाश से बढकर बहुत कुछ है. शायद मुफ्त में मिली आजादी को बहुत सस्ता समझ रहें हैं हम.

इस बार नहीं
इस बार जब वह छोटी सी बच्ची मेरे पास अपनी खरोंच ले कर आएगी
मैं उसे फू फू कर नहीं बहलाऊँगा, पनपने दूँगा उसकी टीस को
इस बार नहीं
इस बार जब मैं चेहरों पर दर्द लिखा देखूँगा नहीं गाऊँगा गीत पीड़ा भूला देने वाले
दर्द को रिसने दूँगा, उतरने दूँगा अन्दर गहरे,
इस बार नहीं
इस बार मैं न मरहम लगाऊँगा, न ही उठाऊँगा रुई के फाहे
और न ही कहूँगा की तुम आँखें बंद कर लो, गर्दन उधर कर लो मैं दवा लगाता हूँ
देखने दूँगा सबको हम सबको खुले नंगे घाव
इस बार नहीं
इस बार जब उलझने देखूँगा, छटपटाहट देखूँगा, नहीं दौडूंगा उलझी डोर लपेटने
उलझने दूँगा जब तक उलझ सके,
इस बार नहीं
नहीं करूंगा फिर से एक नई शुरुआत, नहीं बनूँगा मिसाल एक कर्मयोगी की
नहीं आने दूँगा ज़िन्दगी को आसानी से पटरी पर, उतरने दूँगा उसे कीचड में, टेढे मेढे रास्तों पे
नहीं सूखने दूँगा दीवारों पर लगा खून, हल्का नहीं पड़ने दूँगा उसका रंग
इस बार नहीं बनने दूँगा उसे इतना लाचार कि पान की पीक और खून का फर्क ही ख़त्म हो जाए
इस बार नहीं
इस बार घावों को देखना है गौर से
थोड़ा लंबे वक्त तक कुछ फैसले और उसके बाद हौसले
कहीं तो शुरुआत करनी ही होगी
इस बार यही तय किया है

This time when that little girl comes to me with her bruises,
I will not blow gently at her wound, nor distract her, I will let her pain grow.
Not this time.

This time when I see pain on faces I will not sing the song that eases pain
I will let the pain seep in, deep.
Not this time.

This time I won’t apply any balm Nor will I ask you to shut your eyes and turn your head While I gingerly apply medicine I will let everyone see the open, naked wounds.
Not this time.

This time when I see difficulty, uneasiness, I will not run to solve the problems. I will let them become complicated.
Not this time.

This time I won’t pick up my tools as a matter of duty. I will not make a new beginning. Nor will I stand as an example of one dedicated to my job I will not let life easily return to normalcy.

I will let it descend into muck, on the twisting paths I will not let the blood on the walls dry out. Nor will I let its color fade away. This time I won’t let it become so helpless. That you can’t tell blood from paan-spit.
Not this time.

This time the wounds need to be watched Carefully For a long time.
Some decisions are needed and then some brave moves to be made. We have to begin somewhere.

This time this is what I have resolved.

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