कॉलेजों में रूसा पर गुस्सा क्यों? समस्या की जड़ और समाधान

rusaपिछले चन्द दिनों से प्रदेश के महाविद्यालयों में रूसा प्रणाली के अंतर्गत 90 प्रतिशत से अधिक छात्रों का फेल होना एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। व्यवस्था में निरंतर समस्याओं के चलते छात्रों और अविभावकों में लगातार बढ़ते गुस्से को भांप कर शिक्षा विभाग और विश्वविद्यालय एक बार फिर क्षणिक तौर पर हरकत में आ गए। मीटिंगों के दौर आरम्भ हुए और जांच कमेटियां भी। सब ठीक-ठाक होने के आश्वासन के बावजूद विश्वविद्यालय ने पास प्रतिशत अंकों में ही एकमुश्त छूट दे डाली। अब कम अंक लेने पर भी विद्यार्थी पास हो सकेंगे। स्कूल स्तर पर बिना फेल किए ग्रेडिंग सिस्टम के विद्यार्थी अब कालेज पहुँचने लगे हैं। ऊपर से परीक्षा की आदत छूटे विद्यार्थी, कालेज में रूसा प्रणाली के तहत पढ़ाई से अधिक महत्त्व परीक्षा पर देने से फेल होने को स्वयं सुनिश्चित कर रहे है, भले ही पास प्रतिशत अंक कितने ही कम क्यों न कर लें। समस्या और उपाय समझने की शुरुआत रूसा प्रणाली को समझने से करनी होगी।

केंद्र प्रायोजित कार्यक्रमों में राष्ट्रीय उच्च शिक्षा अभियान को हिमाचल ने देश में सबसे पहले लागू किया। इसके तहत मानव संसाधन विकास मंत्रालय से राज्य सरकार को शिक्षा के ढांचे को सुदृढ़ करने के लिए आर्थिक मदद मिलती है, इसीलिए सरकार ने इस कार्यक्रम को जल्द शुरू करने के लिए विश्वविद्यालय से सलाह मांगी थी। विश्वविद्यालय ने भी स्वयं को आर्थिक मदद मिलने के लालच में इसे उसी अकादमिक सत्र से शुरू करवाने में हामी भर दी। इस कार्यक्रम को शुरू करने के लिए कुछ शर्तें भी थी जिनमें सेमेस्टर सिस्टम को लागू करना, ‘सी बी सी एस’ से अनेक विषयों के संयोगों को पढ़ने के लिए स्वतंत्र रखना मुख्य थे। प्रवेश प्रक्रिया एवं परीक्षा में सुधार कुछ अन्य शर्तें थी। विश्वविद्यालय ने इस व्यवस्था को अपने यहाँ संचालित स्नातकोत्तर (पी जी) कक्षाओं में तो लागू नहीं किया जहाँ आदर्श छात्र-शिक्षक अनुपात और सेमेस्टर सिस्टम पहले से ही विद्यमान थे परंतु उसने इसे अपने से सम्बंधित सभी महाविद्यालयों पर थोप दिया और वो भी बिना पूरी तयारी के और बिना हिस्सेदारों की राय ले कर।

फिर क्या था, प्रदेश के कोने कोने में स्थापित कालेजों में अफरा-तफरी फैलनी शुरू हुई क्योंकि यहाँ छात्र-शिक्षक अनुपात बहुत असंतुलित था, अनगिनत विषयों के संयोगों के लिए आधारभूत ढांचे का भी बड़ा अभाव था। शहरों के बड़े कालेजों में विभिन्न विषय संयोगों से शिक्षकों और कमरों की भारी कमी पड़ी वहीं कुछ अच्छे भवन वाले नए कॉलेज विद्यार्थियों और शिक्षकों की ही राह ताकते रहे।

पास प्रतिशत अंकों को बढ़ाने गिराने की तरह शिक्षकों के व्याख्यान को भी प्रतिदिन साढ़े चार घंटे कर दिया जो न तो प्राणी विज्ञान व शिक्षाशास्त्र में संभव है और न ही दुनिया के किसी कोने में सोचा भी जा सकता है। इस नई व्यवस्था के अंतर्गत, साल में दो सेमेस्टरों के ज्यादा दिन परीक्षाओं और उससे जुड़ी मूल्यांकन गतिविधिओं में ही ज़ाया होने लगे।

इसकी वजह से दशकों से चल रहे वार्षिक सत्र के मुकाबले, पढ़ाई के दिन लगभग एक तिहाई हो कर रह गए। छात्रों के लिए परीक्षा पढ़ाई से ज्यादा महत्वपूर्ण बनाई गई जिसमें परीक्षा की तैयारी करने के लिए भी कोई ब्रेक का प्रावधान नहीं है। परीक्षाओं का लंबा दौर और आंतरिक व विश्वविद्यालय स्तर के मूल्यांकन के सामंजस्य की कमी ने छात्रों को आधे-अधूरे परीक्षा परिणामों के साथ इधर-उधर भटकाया हुआ है।

विदेशों से आयातित इस व्यवस्था ने छात्रों को हर काम के लिए जहाँ सायबर कैफ़े घुमाना शुरू किया वहीँ कालेजों और विश्वविद्यालय को भी कंप्यूटरीकरण के अल्पविकसित ढांचे ने उलझाया हुआ है। लागू होने से पहले इस व्यवस्था बारे छात्र, अविभावक और शिक्षक श्रेणी के किसी भी नुमान्यदे से किसी स्तर पर भी राय नहीं ली गई। हालाँकि ज़मीनी स्तर पर निरंतर आती गई मुश्किलों को शिक्षक संघ ने विश्वविद्यालयों से उपाय सहित सुझा कर व्यवस्था को काफी समय डूबने से बचाया। परंतु विभाग और विश्वविद्यालय में आपसी सामंजस्य की कमी के चलते निरंतर प्रयोगरत यह व्यवस्था कभी अधिकाँश छात्रों को फेल करती है और तो कभी सभी को पास। उपाय पूरी तरह से कृत्रिम है जो कभी उत्तीर्ण अंक बदलवाते है या फिर डिग्री अर्जित करने हेतु कुल क्रेडिट। ऊपरी स्तर पर इस व्यवस्था का बचाव करना भले एक बड़ी मजबूरी है परंतु पढ़ने वाले छात्र और आदर्श शिक्षक इस व्यवस्था के दोषों को भली-भांति समझते हैं जिसे हमारी व्यवस्था के संचालक समझने को कभी तैयार ही नहीं।

बीमारी पेट की है और इलाज टांग का किया जा रहा है। एक तूफ़ान थामने के चक्कर में नए से नए प्रयोग ऐसे किए जा रहे है जैसे कोई नया सीखने वाला चिकित्सक चूहों के बजाय रोगी पर सीधे हाथ आज़मां कर शुरुआत कर रहा हो।

यहाँ एक बात साफ़ है कि उच्च कार्यालयों में बैठे स्वयं भी शिक्षक रहे अधिकारी भी हर वर्ष बदलते शिक्षा के ज़मीनी आयाम को समझने में नाकाम हो जाते हैं। तभी हर नया प्रयोग हर सत्र के नए स्नातक युवा को नए से नए नियमों में उलझा करकर नित-नई मुश्किलें पैदा कर रहा है।

सुझावों में पहली बात यह है कि केंद्र का कार्यक्रम राज्यों के लिए अनिवार्य नहीं, शायद इसीलिए बहुत से प्रदेश इसे अपनाने से परहेज़ करते रहे। आखिर करोड़ों के अपने निवेश किए हुए ढांचे को चंद मदद के लिए बर्बाद तो नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर, ऐसा भी नहीं कि सेमेस्टर जैसी आवश्यक शर्तों में छूट देने के लिए केंद्र सरकार न कर दे, अगर विशेष परिस्थितियों को सही ढंग से पेश किया जाए, क्योंकि बहुत से और चल रहे केंद्र प्रायोजित कार्यक्रमों में भी हिमाचल को विशेष दर्ज़े में रख कर कुछ शर्तों में छूट अवश्य मिलती है।

दरअसल सबसे बड़ी बीमारी सेमेस्टर सिस्टम है जिसकी वजह से विद्या अर्जित करने में पढ़ने-पढ़ाने की सबसे अहम गतिविधि एक तिहाई होकर रह गई है। साल के दो हिस्सों में बंटकर सेमेस्टर व्यवस्था में मध्यावधि परीक्षा, सेमेस्टर अंत परीक्षा और दोनों का मूल्यांकन कार्य साल में दोगुना हो गया है जो बहुत समय को नष्ट कर रहा है। हिमाचल की विशेष भौगौलिक परिस्थितियां साल के 365 दिनों में से बहुत दिनों को पढ़ाई के काम के लायक नहीं रखती। ऊपर से जो दिन बचते भी हैं वो भी अन्य मैदानी राज्यों के मुकाबले पूर्ण कार्यदिवस नहीं हो पाते क्योंकि कार्यदिवस 10 बजे से भी बड़ी मुश्किल से आरम्भ होता है जो लगभग 3 बजे समाप्त हो जाता है। इसका मुख्य कारण अधिकाँश छात्रों का रोज़ाना अपने निकटतम कॉलेज पहुँचने और वापस घर जाने के संघर्ष से जुड़ा है जिसमें एकलौती बस, सड़क से घर तक की पैदल यात्रा प्रमुख है।

शिक्षा विभाग और विश्वविद्यालय की जिम्मेवारियां तय होना अति आवश्यक है वरना दोनों ही बहुत से मुद्दों को एक दूसरे पर अक्सर थोपते नज़र आते है। सम्पूर्ण गतिविधियों को एक निश्चित समय-अवधि में शामिल किए हुए अकादमिक केलेंडर में अभी तक न ही विभाग और न विश्वविद्यालय कोई सामंजस्य बिठा पाया है। फलस्वरूप पढ़ाई, परीक्षा एवं मूल्यांकन की अवधियां एक दूसरे के समय को नष्ट करके सही आंकलन नहीं कर पा रही। विभाग और विश्वविद्यालय कोई भी निर्णय लेने से पहले धरातल पर काम करने वाले शिक्षकों एवं छात्रों से भी अवश्य संवाद करें क्योंकि असली समस्याएं यहीं पैदा होती है जिनका अंदेशा वक्त से पहले भी लगाया जा सकता है अगर सही गहन मंथन किया जाए। आज के समय में केंद्र प्रायोजित कार्यक्रमों की राज्यों की आर्थिकी में विशेष महत्वता है, इस बात से कोई भी इनकार नहीं कर सकता। परंतु शिक्षा का क्षेत्र बौद्धिक क्रिया कलापों से जुड़ा होने के कारण इस पर सड़क, कुओं, चैकडैम बनाने में मदद करने वाले केंद्र प्रायोजित कार्यक्रमों जैसा प्रयोग नहीं किया जा सकता।

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2 Responses to "कॉलेजों में रूसा पर गुस्सा क्यों? समस्या की जड़ और समाधान"

  1. Surjeet chandel   September 16, 2016 at 8:53 pm

    Now even if RussA is rolled back by the old anual system, students will certainly demand for Russa as they are in a habit of getting through the examination without any sort of hard work. There is not any problem with Russa but students are exploiting its implementation, we all know how?

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  2. Rakesh Sharma   September 17, 2016 at 6:56 am

    You are absolutely right Mr. Chandel. The system having less focus on teaching learning activity has completely spoiled the current generation and will also spoil the calibre of teachers with enthusiasm of teaching. Students who don’t want to study and teachers having less interest in main teaching activity will not desire a roll back from current chaotic situations providing some definite benefits of doubt as an advantage.

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