गुणात्मक शिक्षा व शिक्षक व्यवसाय को बढ़ता खतरा

पिछले कुछ समय से हिमाचल में सरकारी स्कूल-कॉलेज-विश्वविद्यालय में दी जा रही शिक्षा के बारे में कई अहम सवाल खड़े होते आए हैं। इसमें न सिर्फ इन संस्थानों में बुनियादी सुविधाओं और आधारभूत ढांचे की कमी उजागर हुई बल्कि शिक्षकों की कमीं और उनकी नाना प्रकार की तदर्थ नियुक्तियां भी समाचार दैनिक सुर्ख़ियों में रहती आई है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या सरकारी लक्ष्य सिर्फ राज्य एवं केंद्र प्रायोजित कार्यक्रमों के पैसे खर्च करके सरकारी संस्थानों में छात्र नामांकन अनुपात बढ़ाना है या शिक्षा की गुणवक्ता को बढ़ाना? हालाँकि दोनों में सामंजस्य स्थापित करना अर्थशास्त्र विज्ञान की ‘आर्थिक विकास दर और समानता की दुविधा’ जैसा है। अब ऐसे में एक बड़ा सवाल यह है कि हिमाचल जैसे प्रदेश में जहाँ 90% लोग अभी भी ग्रामीण क्षेत्र में रहते हैं वहां सरकारी शिक्षा के गिरते स्तर से उन जन-अपेक्षाओं का क्या होगा जो बड़ी उम्मीदों से अपने बच्चों आर्थिक तंगी में पढ़ा रहे हैं। बेरोजगारी की फ़ौज में निरंतर बढ़ोतरी एक बड़ी चिंता का कारण है।

यह सबसे दुखद है कि सरकारी शिक्षा के गिरते स्तर के प्रति समाज और इसके नुमान्यदें ही अनदेखी में सबसे आगे है जबकि यही वो तबका है जो स्वयं इसी सरकारी शिक्षा व्यवस्था की देन है। थोड़े आर्थिक हालात सुधरने और शहरी देखा-देखी के चलते अपने बच्चों को शहरों व कस्बों में खुले निजी स्कूलों में शिक्षा देते ये लोग यह भूल गए कि इसी सरकारी शिक्षा ने उन्हें स्वयं यहाँ तक पहुँचाया है। सिर्फ शिक्षा क्षेत्र में ही खर्चों की कटौती और तदर्थ नियुक्तियों के नित नए प्रयोग सरकारी शिक्षा को निरंतर कमज़ोर कर रहे है। ऐसे में सस्ती दर पर हो रही नियुक्तियां जहाँ एक ओर मैरिट को आकर्षित नहीं करती वहीँ चोर दरवाज़े के ज़रिए सरकारी क्षेत्र में घुसना बेरोज़गारों की मज़बूरी व एक मुख्य लक्ष्य बन जाता है।

हालाँकि नियमित होने और निम्न मज़दूरी से जूझते जूझते शिक्षक शिक्षा को अधर में छोड़े मज़बूरन संगठन, शिष्टमंडल और फूल मालाओं तक ही सिमट रहे हैं। ऐसे में हालात यहाँ तक पहुँच चुके हैं कि आज अग्रणी शिक्षा या तो बर्तानवी काल के मिशनरी और कान्वेंट स्कूलों तक सिमट गई है और या तो पड़ोसी राज्य के संस्थानों में।

यह अब विशेष चिंता का विषय है कि प्रदेश के गठन के बाद अब तक हम क्यों कोई ऐसा स्कूल, कॉलेज और संस्थान नहीं बना पाए जहाँ पड़ोसी राज्य के लोग भी ऐसे ही कतार में लगे हों जैसे हम पडोसी राज्यों में नज़र आते हैं।

ज्यादातर अफसरशाही और नीति निर्धारकों के अपने बच्चे भी यहीं पलायन करके गौरवान्वित हुए पड़े हैं हालाँकि इलाहाबाद उच्च न्यायलय के सभी नौकरशाह और जन प्रतिनिधि को सरकारी शिक्षा लेने के आदेश सभी एक बड़े विरोधाभास के चलते शिक्षकों पर ही समेट देते हैं।

यहाँ एक बात और महत्वपूर्ण हैं कि ऐसी शिक्षा व्यवस्था में जहाँ छात्रों और अविभावकों की आकांक्षाओं को पूरा न हो पाने का खतरा लगातार मंडराता है वहीँ शिक्षक व्यवसाय में आदर्श और मेहनतकश लोगों के हतोत्साह की भी एक बड़ी चिंता है। पिछले कुछ दशकों में समाज में व्यवसाय का चुनाव ‘सत्ता व शक्ति’ के मद्देनज़र ही होता आया है जबकि एक सच्चे शिक्षक व्यवसाय में आदर्शवाद और शैक्षणिक जनून के चलते ‘सत्ता व शक्ति’ के लिए ज्यादा लालसा नहीं होती। इस सबके बावज़ूद, समाज में शिक्षकों का लगातार तिरस्कार और नीति निर्धारकों द्वारा निरंतर प्रताड़ना सन्देश समाज में ही और नफ़रत बढ़ाने का काम कर रहे हैं जिससे अब इस व्यवसाय में सिर्फ मजबूर बेरोज़गार ही आकर्षित होंगे न कि आत्मसम्मान और निपुणता से भरपूर शिक्षित वर्ग।

ऐसे माहौल में अब सभी कैसे खामोश बैठ सकते हैं क्योंकि शिक्षा में तदर्थ प्रयोग समाज में बढ़ रहे अपराधों के पीछे की सच्चाई को भी बयान करने लगे हैं। हिमाचल के अखबारों में नित नई छपने वाली बलात्कारी और खूनी घटनाएं इस ओर एक गंभीर सवाल पैदा करती हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2016 की प्रथम तिमाही में ही प्रदेश में 3929 आपराधिक केस दर्ज हुए हैं जिनमें 44 रेप और 25 खून के हैं। हालाँकि बहुत सी घटनाएं बदनामी के डर से रिपोर्ट ही नहीं हो पाती परन्तु रिश्तों को तार तार करने वाली ऐसी घटनाएं पहले सिर्फ सुदूर प्रदेशों से ही सुनाने को मिलती थी जो देवभूमि में सोच से ही बाहर थी। माने न मानें, इस सब के पीछे कहीं न कहीं सही शिक्षा एवं नैतिक मूल्यों का ह्रास ही मुख्य कारक हैं।

अभी भी वक्त है कि हम शिक्षा व्यवसाय को दफ्तरी व्यवसाय की मानसिकता से तोलना छोड़ दें। समाज में शिक्षकों का चुनाव मैरिट से ही निर्धारित हो और उसकी निरंतर शिक्षा-दीक्षा शिक्षण कार्यों में निपुणता की गवाह बने न कि लालफीताशाही और सरकारी उपेक्षा की जो शिक्षक को निरंतर दूर दराज़ और इधर उधर करने वाले तबादलों में ही उलझाए हुए है। ऐसे में शिक्षक की मजबूरी राजनेताओं की सभी मतदाताओं को आकर्षित करने की मजबूरी से कहीं बड़ी है। शिक्षा व्यवसाय में नैतिकता से ही कर्मठता जुड़ सकती है इसलिए ज़ोर जबरदस्ती के बल पर कभी भी आदर्श मौलिक शिक्षा नहीं दिलवाई जा सकती। प्रदेश को केंद्र प्रायोजित कार्यक्रमों की मदों के खर्चे से ऊपर उठकर ज़मीनी शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करना होगा क्योंकि शिक्षा में सुधार कोई सड़क-तालाब निर्माण नहीं जो कि मनरेगा या रूसा जैसी केंद्र प्रायोजित योजनाओं से संभव हो पाएगा।

खोखली शैक्षणिक व्यवस्था बेरोज़गारों की एक भयावह लंबी फ़ौज तैयार करती है जिसमें भले राजनेताओं के पीछे उदघोष के लिए एक बड़ा आसान तबका तैयार होता हो परंतु प्रदेश को निरंतर खोखला करने के लिए यह प्रचलन बेहद खतरनाक है।

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One Response to "गुणात्मक शिक्षा व शिक्षक व्यवसाय को बढ़ता खतरा"

  1. Roshan Jaswal   September 13, 2016 at 5:00 am

    समसामायिक और सारगर्भित लेख। आपको साधुबाद

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