सर्दियाँ आख़िर आ ही गयीं। इस समय रात का एक बजा है और कडाके की ठण्ड पड़ रही है। इस ठण्ड में आख़िर नींद कहाँ आने वाली है। सोचा क्यों न कुछ लिखा जाए। सर्दियाँ आते ही मुझे अपने गाँव कोटगढ़ की याद आती है। बचपन में स्कूल की छुट्टियां सर्दियों में ही होती थी। तो बस स्कूल ख़तम हुए नहीं के हम सभी बच्चे कोटगढ़ का रुख कर लेते थे। और यह दो महीने पूरे साल के सब से यादगार पल होते थे। दो महीने बस धमाचोक्ड़ी और कुछ नहीं। शिमला की तंग गलियों से निकलकर गाँव के खुले खेत खलिहान खूब भाते थे। साथ में दादा दादी का दुलार जो हमें इन दो महीनों में बिल्कुल बिगाड़ देता था।
हम भाई बहनों की दिनचर्या सुबह सात बजे शुरू होती। उठे और पकड़ लिया बल्ला। नौ बजे तक क्रिकेट खेला जाता। बीच में माँ आकर कई बार खाने के लिए बुलाती पर सुनता कौन था? सुबह की रसोई नौ बजे बंद होती थी इस लिए मन मार कर खाने के लिए आना पड़ता। खाना खाया, स्नान किया और फ़िर चल दिए मैदान की ओर। माँ घर के काम से फारिग होती तो हमारे पढ़ने का समय हो जाता। ग्यारह से एक बजे तक पढ़ाई होती और माँ फिर दिन के खाने में व्यस्त हो जाती। हम लोग दिन का खाना लेकर खेतों में जाते जहाँ दादाजी और बाकी गोरखा कर्मी हमारी राह देख रहे होते। वह लोग खाने में व्यस्त हो जाते और हम उनके औजारों के साथ धींगामुश्ती करते। इस के बाद शुरू होता पेडों पर चढ़ने का खेल। कौन सब से ऊपर वाली डाल पर चढ़ कर दिखलाएगा। जो जीतता उसे गाँव के बाजार भेजा जाता दिन का अखबार लाने और साथ में मिलता एक रुपया बख्शीश।
हम बाकी बच्चे खेतों में चर रही गाय लेकर उनको घर वापिस ले चलते। जेसे ही हम दादाजी की नज़रों से ओझल होते हमारा अपना खेल शुरू हो जाता। कौन गाय के थन से धार मार कर सीधा मुहं में दूध पिएगा। आनन् फानन गाय के लिए घास का प्रभंद किया जाता ताकि वह एक जगह खड़ी रहे। हम लोग बारी बारी गाय का दूध पीते । इस खेल में मेरी मास्टरी थी। हम सब बच्चे लगभग दो किलो दूध पी जाते। घर पहुँचने पर जब गाय को दुहा जाता तो वह दूध कम देती। सब हैरान। रात को जब खाने की बारी होती तो हम सब भूख न होने का बहाना करते। भला दो किलो असली दूध छकने के बाद इस छोटे से पेट में कहाँ जगह बचती थी। उस ज़माने में टेलीविजन नाम की चिड़िया नहीं होती थी। रात के भोजन के बाद दादाजी खँजरी लेकर पहाड़ी गीतें गाते और हम बच्चे नाचते। शायद इस से बेहतर कोई मनोरंजन नहीं हो सकता था। हम तब तक नाचते जब तक थक हार कर वहीँ सो नहीं जाते थे। दादाजी हम सब को बिस्तर पर छोड़ कर आते और अगले दिन फिर वही धमाचोक्ड़ी मचती।
लोहड़ी आती और घर में उत्सव का माहौल बन जाता। पहाड़ों में इसे मकर सक्रांति के नाम से मनाया जाता है और पहाड़ी भाषा में इसे ‘माघ साजा’ कहा जाता है। दादाजी बताते थे कि माघ और ब्राघ राते में ही निकलते हैं याने इस रात को बर्फ गिरती थी। माघ साजा पर घर में कई पकवान बनते। सुबह पाँच बजे उठ कर स्नान होता और मुहं अंधेरे में पाजा के पत्तों के साथ हवन किया जाता। फिर गाँव के मन्दिर में जाकर ग्राम देवता के दर्शन किए जाते थे। वापस आकर माह की खिचडी मिलती और साथ में ढेर सारा घी। हम बच्चे खूब छक कर खिचडी और घी का आनंद लेते। इतना खाने के बाद तो सिर्फ़ आराम ही किया जा सकता था। बाद में बच्चों की टोली जुटती और सब निकल जाते लोहडी मांगने। हमारी जेबें रेव्ड़ी, गच्चक से भर जातीं। कहीं कहीं तो एक या दो रुपये भी मिल जाते। पैसे हम माँ को दे देते और रेव्ड़ी गच्चक संभाल कर रख लेते। भला बचपन में पैसों का क्या मोल? घर पर तब तक पकैन, बड़े, चूरे, संनसे बने होते थे। यानि एक और भोज। अगले दिन यह पकैन आदि घर की बेटियों को उनके ससुराल भेजे जाते जिसे पाओड़ कहा जाता है। यह काम भी हमारे ही जिम्मे आता और हम चल देते दो-तीन दिनों की मेहमानी पर।
अब तो यह सब एक स्वप्न ही लगता है। जीवन की व्यस्तता में वह दिन न जाने कहाँ छूट गये हैं। मैं जब आज के बच्चों के बचपन से अपने बचपन के दिनों की तुलना करता हूँ तो केवल मुस्करा कर रह जाता हूँ।
पेश है दुल्ला भट्टी का वोह गीत जो हम लोहडी पर गया करते थे। उम्मीद है यह अब भी आप सब को याद होगा
सुंदर मुन्द्रिया ..हो
तेरा कौन विचारा ..हो
दुल्ला भट्टी वल्ला ..हो
दुल्ले ने ती विअहियी ..हो
सेर शकर पाई ..हो
कुडी दे बोजे पाई ..हो
शाल्लू कौन समेटे ..हो
चाचा गाली देसे ..हो
चाचे छोरी कुटी ..हो
ज़मिन्दारण लुटी ..हो
ज़मिन्दारा सिदाये ..हो
गिन -गिन पोले लाई ..हो
इक पोला रह गया ..हो
सिपाही फरह के लेई गया ..हो
आखो मुंडाओ ताना ..
मुकी दा दाना ..
आना लेई के जाना
लोहडी और मकर सकरान्ति की अग्रिम शुभकामनाएं सहित आप सब को नव वर्ष में शुभ की कामना।
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वाह नितिन भाई वाह. मज़ा आ गया. आपने तो बचपन की यादें ताजा करा दी. गोरू के साथ क्रिकेट खेलना, पीठु खेलना, अशोक चक्र खेलना और जैसे जैसे व्यस्क होते गए, वैसे वैसे आपस में यौन ज्ञान बांटना, और कभी कभी मस्ती करते करते किसी बैल पर बैठ जाना, ये यादें हैं बचपन की गाँव की.
मुझे मेरे दादाजी की तो अधिक याद नहीं है, क्यूंकि वे शीघ्र ही गुज़र गए थे, परन्तु दादी की याद काफ़ी है. जब माँ डांटती थी, तो दादी के पीछे छुप जाना. लकडी कटना, उसे ढो कर घर लाना, खेत में जब हल के बाद जोल चलाते थे तो एस्पे सवारी करना, मज़ा आ जाता था, बैल की पूँछ पकड़ के. खलियान में जब बैलों को अनाज पे घूमाते थे तो ख़याल रखना होता था की कहीं बैल गोबर न कर दे. मैं गर्मी की छुटियाँ भी मिक्स कर गया हूँ. खैर कोई नहीं. सर्दियों में जू नानियाँ मैयके आयी होती थी, उनसे पांड में बैठ कर राक्षसों की कहानियां सुनना. सर्दियों में बर्फ से बिजली की तारें टूट जाती थी तो झोकटी से काम चलाया जाता था. और सुबह जब पांड से निकलते थे तो सब काले हुआ करते थे झोकटी के धुएं से. माघ साजी के बाद आती थी शिवरात्रि और सुबह मामा की घिट्टी का इंतज़ार करना. वो साथ में आटे के बने हुए बकरे, बाघ, कुकुर, घुगती लाते थे. बड़े पोल्दु तो खैर होते ही थे.
वैसे जो ऊपर आपने कहावत कही है, वो ऐसी है – माघ, ब्राग सूती शयाली दाबा ही. मतलब कि पौष में बर्फ दिन को गिरती है और माघ में रात को. अतः शाम को तो मौसम साफ़ था, मगर सुबह उठ के देखा तो बर्फ पडी है. मतलब की सोयी हुई शयली भी दब जाती है. कहीं न कहीं इसका तात्पर्य यह भी है कि पौष में ज्यादा ठण्ड होने के कारण बर्फ दिन में ही गिर जाती है, और माघ आटे आटे गर्मी होने लगती है और बर्फ रात को ही पड़ती है. और अगर आप ध्यान देंगे तो पायेंगे कि माघ की बर्फ ज़्यादा पानी वाली होती है. पौष की बर्फ फोफ होती है.
परन्तु मज़ा आ गया. लगे रहो. बहुत कुछ है लिखने को परन्तु समय का अभाव है. शायद फ़िर कभी…
प्रिय विविध
आप जैसे गुरु लोगों से शाबाशी मिलकर अच्छा लगा. यौन ज्ञान से याद आया कि गाँव में गाय का गर्भ ठहरने के लिए इंजेक्शन दिया जाता था. उससे पहले गाय की अन्दर से सफाई की जाती थी. अब यह सब देखकर एक दिन मैं भी डॉक्टर बन गया और डाल दिया हाथ. गाय शायद जानती थी कि हम कोई खुराफात करने वाले हैं. जो जोर से उस दिन दुलत्ती खायी, आज भी याद है. बचपन की उन यादों के साथ यहाँ आने पर आभार.
लोहडी और मकर सकरान्ति की आपको भी हार्दिक शुभकामनाएं। आपका लेख पढ़ कर मन अतीत में कहीं खो गया एवम अत्यन्त प्रसन्न हो गया। कृपया ऐसे लेख लिखते रहें। इस आप धापी भरे जीवन में इस खुशी को प्रदान करने के लिए आपका धन्यवाद।
प्रिय रोहित
आपको यह आलेख पसंद आया. आभार. वैसे आप भी बहुत अच्छा लिखते हैं. लगे रहिये.