परंपरा का बुजका

पिछले दिनों हमारे एक चचेरे भाई का फोन आया कि वे मुंबई पहुंच गए हैं, कई दिन के सफर के कारण बच्चे-बडे सभी बीमार पड़ गए हैं और रात को ही लौट जाना है, इसलिए घर नहीं आ पाएंगे। चाचीजी के लिए कुछ सामान लाए थे, यहीं छोड़ रहे हैं, तुम आकर ले जाना। सुबह का […]

ढोलरू – प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का गान

ढोलरू – प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का गान

शायद दो साल पहले की बात है. सुबह तैयार हो कर दफ्तर के लिए निकला तो हवा खुशगबार थी. यूं वक्‍त का दबाव हमेशा बना रहता है लेकिन उस दिन हवा में कुछ अलग तरह की तरंग थी. जैसे सुबह और शाम के संधिकाल का स्‍वभाव दिन और रात के स्‍वभाव से अलग होता है, […]

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